- 2026-01-06 14:28:42
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**गया, ०६ फरवरी २०२६:** बिहार के गया जिले के टंकुप्पा प्रखंड से ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जो सरकार की दो महत्वाकांक्षी योजनाओं – 'लोहिया स्वच्छ बिहार मिशन' और 'शराबबंदी' – के जमीनी हकीकत पर करारा प्रहार करती हैं। जिलाधिकारी के निरीक्षण के दौरान टंकुप्पा ब्लॉक के सरकारी आवास परिसर से जो चित्र सामने आए हैं, वे हैरान कर देने वाले हैं।
**सफाई की जगह कचरे का ढेर, योजना की हकीकत बयां**
निरीक्षण के दौरान खाली शराब की बोतलों के साथ-साथ आवास के मैदान में कचरे का बड़ा ढेर भी देखने को मिला। यह नज़ारा सरकार की 'लोहिया स्वच्छ बिहार मिशन' की पोल खोलता नज़र आता है। इस योजना की शुरुआत खुद ब्लॉक स्तर से होती है, जिसका उद्देश्य गांव से लेकर प्रशासनिक इकाइयों तक स्वच्छता सुनिश्चित करना है। लेकिन टंकुप्पा का यह चित्र बताता है कि जहां इस योजना को लागू करने वाले कर्मचारी स्वयं रहते हैं, वहां सफाई का कोई बंदोबस्त नहीं है। आवास के प्रांगण में लगा कचरे का अंबार साफ बताता है कि स्वच्छता अभियान की राह ब्लॉक कार्यालय के दरवाजे से ही अटक गई लगती है।

**मंत्री के बयान की पुष्टि, एक दशक बाद भी नहीं सुधरा सिस्टम**
इसी परिसर से मिली खाली शराब की बोतलें केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के ताजा बयान को सही साबित करती हैं। मांझी ने आरोप लगाया था कि सरकारी कर्मचारी रात में शराब पीते हैं। टंकुप्पा से मिले सबूत इस आरोप को बल देते हैं। यह घटना एक गहरा सवाल खड़ा करती है: **क्या सरकारी तंत्र आज भी उसी पुरानी मानसिकता में जकड़ा हुआ है?** बिहार में शराबबंदी कानून 2016 में लागू हुआ। आज एक पूरा दशक बीत जाने के बाद भी, जब सरकारी आवासों से शराब की बोतलें बरामद होती हैं, तो लगता है कि सिस्टम की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। कानून बनाने वाली मशीनरी ही उसे तोड़ रही है।
**जनता में आक्रोश: "कानून सिर्फ गरीब के लिए?"**
इस मामले ने स्थानीय नागरिकों में गुस्सा और निराशा फैला दी है। लोग सीधा सवाल पूछ रहे हैं: "जब कोई गरीब शराब पीता पकड़ा जाता है, तो पुलिस उसे पीटती है, जेल में ठूंस देती है। उसकी जिंदगी बर्बाद हो जाती है। लेकिन सरकारी बंगलों में बैठे बाबू लोग शराब का दौर चलाकर आराम से सो जाते हैं। क्या यही है शराबबंदी का सच? क्या कानून सिर्फ गरीबों के लिए ही बना है?"
**लोहिया स्वच्छ योजना का मजाक**
एक स्वच्छ बिहार का सपना लेकर चली योजना का हाल जब ब्लॉक कार्यालय परिसर में ही यह है, तो गांव-गांव में इसकी स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। कर्मचारी अपने घर के आगे ही कचरा फैंक रहे हैं, तो वे जनता को स्वच्छता का पाठ कैसे पढ़ाएंगे? यह सिर्फ उपेक्षा नहीं, बल्कि पूरी योजना के प्रति एक तरह का मजाक उड़ाना लगता है।
**अब क्या?**
इस घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। अब नजर जिला प्रशासन और शीर्ष नेतृत्व पर है कि वे इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाते हैं। क्या सिर्फ एक रिपोर्ट दर्ज करके मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा, या फिर उन अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई होगी, जो लगातार सरकार के आदेशों और जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? बिहार की जनता का धैर्य अब टूट रहा है, और उन्हें जवाब चाहिए।
Comments(01)
Ritesh Panday
June 10, 2025विपिन कुमार की आप्त सचिव के रूप में नियुक्ति एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय है। उनकी विशेषज्ञता और अनुभव निश्चित रूप से मंत्री डॉ. इरफान अंसारी के कार्यों को सुचारू रूप से संचालित करने में सहायक होगी। यह नियुक्ति अस्थायी रूप से की गई है और मंत्री के कार्यकाल तक प्रभावी रहेगी
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